निवेश के तरीके

क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं?

क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं?
कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान भारत सहित पूरी दुनिया में क्रूड ऑयल की खपत कम हुई, जिसकी वजह से कोरोना काल में क्रूड ऑयल के दाम औसतन 30 से 40डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे। जिसकी वजह से भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल काफी कम हो गया। जानकारों की मानें तो जब क्रूड ऑयल के दाम में एक डॉलर कम होता है तो भारत के क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल में 2900 करोड़ रुपए की कटौती हो जाती है। इस दौरान क्रूड ऑयल के दाम औसतन 50 फीसदी से ज्यादा कम हुए। ऑयल मिनिस्ट्री के प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की रिपोर्ट की मानें तो भारत का इस साल का ऑयल इंपोर्ट बिल आधा रह सकता है।

क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं?

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श्रीलंका के बाद आई बांग्लादेश की बारी, खत्म होने को है विदेशी मुद्रा भंडार

श्रीलंका आजादी के बाद से सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। देश की विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुकी है। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने कहा है कि देश बेहद गंभीर आर्थिक समस्या का सामना कर रहा है। देश के पास गैस के पैसे देने तक के पैसे नहीं है।

श्रीलंका के बाद आई बांग्लादेश की बारी, खत्म होने को है विदेशी मुद्रा भंडार

श्रीलंका आजादी के बाद से सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। देश की विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुकी है। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने कहा है कि देश बेहद गंभीर आर्थिक समस्या का सामना कर रहा है। देश के पास गैस के पैसे देने तक के पैसे नहीं है। इसके साथ ही देश में बस एक दिन का पेट्रोल बचा है। इस बीच खबर है कि भारत के एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश की हालत भी ठीक नहीं है। बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार कम हो चुका है। बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की खबर के बाद सरकार ने वाशिंग मशीन, स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल, एयर कंडीशन और रेफ्रिजेरेटर के आयात पर रोक लगा दी है।

बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयात पर होने वाला खर्च बढ़ा है पर उसके मुकाबले निर्यात से होने वाला आय नहीं बढ़ा है। इसके चलते व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। आयात पर ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं उस मुकाबले निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त नहीं हुआ है जिसके चलते विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आ रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आ रही है। और जितना विदेशी मुद्रा भंडार बचा है उसके जरिए केवल 5 महीने के लिए ही आयात जरुरतों को पूरा किया जा सकेगा। और अगर कमोडिटी, क्रूड और खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ती रही है पांच महीने से पहले भी भंडार खत्म हो सकता है। 2021-22 के जुलाई से मार्च के बीच बांग्लादेश में 22 अरब डॉलर के औद्योगिक कच्चे माल का आयात किया है। जो बीते साल की तुलना में 54 फीसदी ज्यादा है। कच्चे तेल के दामों में उछाल के चलते इंपोर्ट बिल 87 फीसदी बढ़ा है। उपभोक्ता उत्पादों के आयात पर 41 फीसदी इंपोर्ट बिल बढ़ा है। इन आंकड़ों से जाहिर है कि इंपोर्ट पर खर्च बढ़ता जा रहा है।

बांग्लादेश का निर्यात का लक्ष्य 2021-22 वित्त वर्ष के 10 महीनों में ही पूरा हो गया. बांग्लादेश ने 43.34 अरब डॉलर के उत्पादों का निर्यात किया। जो बीते साल से 35 फीसदी ज्यादा है। जुलाई 2021 से अप्रैल 2022 के बीच गारमेंट्स एक्सपोर्ट्स, चमड़े और उससे बने उत्पादों के निर्यात बढ़कर एक अरब डॉलर अमेरिकी डॉलर से ऊपर जा पहुंचा है। जून और उससे बने उत्पादों के एक्सपोर्ट से भी एक बिलियन डॉलर के करीब आय हुई है। ऐसे में बांग्लादेश का आयात बिल बढ़ा है तो भी निर्यात से आय बढ़ सकता है। लेकिन निर्यात बढ़ने के बावजूद आय घटी है। डॉलर की कीमतों में बैंक और ओपेन मार्केट में 8 रुपये के करीब का अंतर है। इसके चलते लोग प्रवासी बांग्लादेशी अवैध तरीके से विदेशी मुद्रा भेज रहे क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? हैं जिससे केंद्रीय बैंक के पास विदेशी मुद्रा की कमी आई है। बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक के मुताबिक 2020-21 में प्रवासियों ने 26 अरब डॉलर से ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार भेजा था जो 2021-22 में घटकर 17 अरब डॉलर के करीब रह गया है।

व्यापार घाटा बढ़ने से बांग्लादेश के रिजर्व बैंक को 5 अरब डॉलर से ज्यादा अपने विदेशी मुद्रा भंडार से खर्च करना पड़ा। डॉलर के मुकाबले स्थानीय करेंसी कमजोर होता जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने टका और डॉलर का एक्सचेंज रेट 86.7 टका तय किया है लेकिन बैंक आयातकों से 95 टका वसूल कर रहे हैं। जिसके चलते आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ी है जिससे महंगाई बढ़ी है।

बांग्लादेश की सरकार ने डॉलर संकट से निपटने के लिए लग्जरी उत्पादों क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? के आयात पर रोक लगाया है तो सरकारी अधिकारियों के विदेश यात्रा को बैन कर दिया है। साथ ही गैर जरुरी परियोजनाओं के निर्माण पर अस्थाई तौर पर रोक लगा सकती है। फिलहाल बांग्लादेश के पास 42 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। परंतु आईएमएफ बांग्लादेश पर विदेशी मुद्रा का सही तरीके से गणना करने का दवाब बना रहा है। अगर बांगलादेश आईएमएफ की बात मानता है तो बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार में 7 से 8 अरब डॉलर की कमी आ सकती है, जिससे संकट बढ़ सकता है।

कोरोना काल में इन पांच कारणों से बढ़ी भारत की विदेशी दौलत, आखिर क्या है इसका राज

नई दिल्ली। दुनिया की किसी भी इकोनॉमी में विदेशी मुद्रा भंडार एक अहम स्थान होता है। इस दौलत से किसी भी देश को विदेशों से सामान मंगाने में काफी आसानी होती है। साथ ही आप अच्छी इकोनॉमी में गिने जाते हैं। अगर बात भारत की करें तो मौजूदा समय में विदेशी मुद्रा भंडार अपने चरम पर है। वो भी तब जब देश कोरोना वायरस के मामले में दूसरे नंबर है। जीडीपी के आंकड़े माइनस में है। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश के पास मौजूदा समय में 575 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। जिसमें लगातार दो महीनों से इजाफा हो रहा है, लेकिन इसकी शुरुआत जून से ही शुरू हो गई थी, जब देश के इस भंडार ने 500 अरब डॉलर का आंकड़ा छुआ था। खास बात तो ये है कि मौजूदा वित्त वर्ष में यह इजाफा 163 बिलियन डॉलर का हो चुका है। सवाल ये है कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कोरोना काल में आसमान पर पहुंच गया। आइए आपको भी बताते हैं।

India's foreign wealth increased due to 5 reasons in Corona period

पहले बात करते हैं विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़ों की
- देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार आठवें सप्ताह तेजी दर्ज की गई।
- 20 नवंबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 2.52 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 575.29 अरब डॉलर हो गया।
- मौजूदा वित्त वर्ष में विदेशी मुद्रा भंडार में 163 अरब डॉलर का इजाफा हो चुका है।
- जून के महीने में विदेशी मुद्रा भंडार 500 अरब डॉलर के पार कर दुनिया में तीसरे नंबर पहुंचा था।
- विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति 2.83 अरब डॉलर की वृद्धि क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? के साथ 533.10 अरब डॉलर पर पहुंचा।
- स्वर्ण भंडार हालांकि 33.90 करोड़ डॉलर घटकर 36.01 अरब डॉलर हो गया।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास आरक्षित निधि 1.90 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.68 अरब डॉलर हो गई।
- विशेष आहरण अधिकार 40 लाख डॉलर बढ़कर 1.49 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

अक्टूबर से लगातार हो रहा है विदेश मुद्रा भंडार में इजाफा

समाप्त सप्ताह की तारीख इजाफा ( अरब डॉलर में ) कुल विदेशी मुद्रा भंडार ( अरब डॉलर में )
20 नवंबर 2.52 575.29
13 नवंबर 4.28 572.77
06 नवंबर 8 568.49
30 अक्टूबर 18.3 560.71
23 अक्टूबर 5.41 560.53
16 अक्टूबर 3.61 555.12
09 अक्टूबर 5.87 551.51
02 अक्टूबर 3.62 545.64

इन कारणों से बढ़ा विदेशी मुद्रा भंडार
सवाल ये है कि आखिर देश में कोरोना काल के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा कैसे? जब इस बारे में ऐनालिसिस किया गया तो समझ आया कि लॉकडाउन के बीच भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल, गोल्ड इंपोर्ट बिल, इडिबल इंपोर्ट बिल, मई से लेकर अब तक विदेशी निवेशकों का भारत में रुझान और सबसे अहम बात रिलायंस की विदेशियों कंपनियों के साथ करीब दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की डील जैसे कारण रहे जिन्होंने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को सपोर्ट किया।

1. भारत का कम हुआ क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल

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कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान भारत सहित पूरी दुनिया में क्रूड ऑयल की खपत कम हुई, जिसकी वजह से कोरोना काल में क्रूड ऑयल के दाम औसतन 30 से 40डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे। जिसकी वजह से भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल काफी कम हो गया। जानकारों की मानें तो जब क्रूड ऑयल के दाम में एक डॉलर कम होता है तो भारत के क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल में 2900 करोड़ रुपए की कटौती हो जाती है। इस दौरान क्रूड ऑयल के दाम औसतन 50 फीसदी से ज्यादा कम हुए। ऑयल मिनिस्ट्री के प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की रिपोर्ट की मानें तो भारत का इस साल का ऑयल इंपोर्ट बिल आधा रह सकता है।

Gold and silver : सोने व चांदी में ऐतिहासिक तेजी

यह बात किसी से छिपी नहीं कि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़े आयातक देशों में से एक है। इसके लिए भारत करोड़ों की विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करता है। लेकिन कोरोना काल में सोने के दाम में इजाफा, गोल्ड ज्वेलरी की डिमांड कम होना और गोल्ड इंवेस्टमेंट कम होने से भारत ने कम आयात किया। आंकड़ों की मानें तो वल्र्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के अनुसार 1995 के बाद भारत में गोल्ड गोल्ड की डिमांड सबसे कम है। जिसकी वजह से अप्रैल के महीने में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 50 किलो था, जबकि पिछले साल समान महीने में 101 टन से ज्यादा था। वैसे मौजूदा समय में गोल्ड इंपोर्ट में हल्का सुधार देखने को मिला है।

3. इडिबल ऑयल इंपोर्ट हुआ कम

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वहीं भारत सिर्फ क्रूड ऑयल और सोने का ही बाहर से आयात नहीं करता है, बल्कि खाने का तेल, जिसे इडिबल ऑयल कहते हैं उसका इंपोर्ट भी काफी होता है। लेकिन बीते 9 महीने से भारत द्वारा इसका आयात काफी कम कर रहा है। पहला कारण तो भारत सरकार द्वारा इस पर लगातार इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ी रही। वहीं लॉकडाउन के क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? कारण भारत बाहर के देशों से कुछ नहीं मंगा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2020 में इडिबल ऑयल इंपोर्ट में 32 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली थी। जिसकी वजह से भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हुई है। वैसे बीते सप्ताह सरकार की ओर क्रूड पाल्म ऑयल से इंपोर्ट ड्यूटी को 10 फीसदी कम किया गया है।

4. विदेशी निवेशकों का बढ़ा रुझान

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वहीं दूसरी ओर मौजूदा वित्त वर्ष में विदेशी निवेशकों का रुझान भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा है। अगर बात नवंबर के महीने की करें तो 20 नवंबर तक विदेशी निवेशकों की ओर से 50 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश किया है। जिसने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर मौजूदा वित्त वर्ष में विदेशी निवेशकों का 30.40 बिलियन डॉलर लग चुका है। जिसने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने का प्रयास किया है।

5. रिलायंस जियो और रिटेल डील भी बना अहम कारण

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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में अहम योगदान जियो प्लेटफॉर्म्स और रिलायंस रिटेल में विदेशी निवेश का भी काफी हाथ रहा है। दोनों ही सब्सिडीयरीज में रिलायंस को 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा मिले हैं। जियो में जहां फेसबुक, सिल्वर लेक, केकेआर अटलांटिक, मुबाडला, विस्टा जैसी बड़ी कंपनियों ने हिस्सेदारी खरीदी है। वहीं रिटेल वेंचर में भी दुनिया की बड़ी कंपनियों की ओर से करीब 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा रुपाया लगाया है। जिसका असर भी विदेशी मुद्रा भंडार में देखने को मिला है।

भारतीय वैश्विक परिषद

अपनी वर्तमान विदेशी मुद्रा संकट के बीच श्रीलंका ने अगस्त 2021 में देश में आपातकाल की घोषणा की थी। श्रीलंका के ज्यादातर बैंक आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए धन मुहैया कराने हेतु विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे हैं। देश के राजस्व में करीब 80 अरब अमेरिकी डॉलर की कमी आई है। [i] सेंट्रल बैंक ने एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 200 रुपये से अधिक की दर से वायदा कारोबार और रुपये के स्पॉट ट्रेडिंग (हाज़िर कारोबार) पर प्रतिबंध लगा दिया है [ii] । इसके कारण इस द्वीपीय राष्ट्र में विदेशी मुद्रा संकट और गंभीर हो गया है। हालांकि, यह स्थिति रातोंरात नहीं बनी है। इसके कई कारण हैं जैसे 2019 में ईस्टर बम हमले, कोविड-19 महामारी का फैलना और कई राजनीतिक फैसले जिन्होंने अपेक्षित परिणाम नहीं दिए। आसन्न संकट को भांपते हुए सरकार ने इस साल की शुरुआत में ही वाहनों, खाद्य तेलों और कुछ अन्य वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाकर इसे टालने की कोशिश की लेकिन इससे कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ। इस संकट की ओर ले जाने वाले कई महत्वपूर्ण कारकों में से कुछ महत्वपूर्ण कारकों का विश्लेषण इस लेख में किया गया है।

2019 में कोलंबो में हुए सीरियल बम विस्फोट के बाद से देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 10% का योगदान करने वाला पर्यटन उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा है। 21 अप्रैल 2019, ईस्टर रविवार को, आत्मघाती हमलावरों ने कोलंबो के तीन चर्च और तीन आलिशान होटलों को अपना निशाना बनाया था। हमले के बाद से काफी समय तक श्रीलंका में पर्यटकों का आना कम रहा। पर्यटन के क्षेत्र में 70% तक की गिरावट दर्ज की गई और इसके कारण श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। पर्यटकों की कमी के कारण विदेशी मुद्रा संकट पैदा हो गया, जुलाई 2020 के आखिर में विदेशी मुद्रा भंडार कम हो कर 2.8 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया जबकि पिछले वर्ष की तुलना में अर्थव्यवस्था में 3.6% [iii] की कमी दर्ज की गई।

इससे पहले की स्थिति सामान्य होती और पर्यटन उद्योग रफ्तार पकड़ता, कोविड -19 ने श्रीलंका समेत पूरे विश्व को प्रभावित कर दिया। हालांकि पहली दो लहरों ने श्रीलंका में कम बर्बादी मचाई लेकिन तीसरी लहर ने तो पूरे द्वीप को बर्बाद ही कर दिया। हालांकि कोविड महामारी के शुरुआती लहरों के दौरान श्रीलंका की स्थिति अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत अच्छी रही, लेकिन चीन और यूरोपीय संघ के देशों जैसे इसके प्रमुख निर्यात गंतव्य स्वास्थ्य संबंधी गंभीर आपात स्थितियों से जूझ रहे थे। इसलिए, इन देशों में श्रीलंका से किया जाना वाला निर्यात स्वाभाविक रूप से प्रभावित हुआ। परिधान के कई कारखाने, जो निर्यात की एक प्रमुख वस्तु और श्रीलंका के लिए विदेशी मुद्रा का प्रमुख स्रोत हैं, महीनों तक बंद पड़े रहे।

निर्माण क्षेत्र को छोड़कर, बीते कुछ वर्षों में श्रीलंकाई उद्योगों को शायद ही कोई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) मिला हो। इसके अलावा, मार्च 2020 में, कोलंबो स्टॉक एक्सचेंज (सीएसई/ CSE) में विदेशी फंडों के बहिर्वाह के कारण एक दिन में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। विदेशी निवेशकों द्वारा रखी गई सरकारी हुंडी और सरकारी बॉन्ड में 9.03% (8.236 अरब रुपये) की जबरदस्त कमी हुई, इसके कारण इसी माह के पहले दो सप्ताहों में 19.6 अरब रुपयों का कुल विदेशी मुद्रा बहिर्वाह हुआ [iv] । स्टॉक एक्सचेंज में हुई गिरावट निश्चित रूप से कोविड-19 का नतीजा था। साल 2020 के दौरान विदेशी प्रेषण में 2.7 अरब अमेरिकी डॉलर की गिरावट के साथ समस्या बढ़ गई थी क्योंकि विदेशों में काम करने वाले श्रीलंकाई महामारी से बुरी तरह प्रभावित थे [v] ।

अब तक श्रीलंका पहले से ही मुद्रा संकट के कठिन दौर से गुजर रहा था। नकदी की कमी से निपटने के लिए श्रीलंका के सेंट्रल बैंक ने बीते 18 महीनों में 800 अरब रुपए छापे हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ रही है [vi] । पैसे के इस प्रवाह ने आपूर्ति को स्थिर बनाए रखते हुए मांग में वृद्धि की है। इसके कारण उच्च मुद्रास्फीति की बुनियादी आर्थिक समस्या पैदा हुई जिसके परिणामस्वरूप मुद्रा का अवमूल्यन हुआ, आयात महंगा हो गया और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बहुत बढ़ गया। मार्च 2020 के पहले सप्ताह से ज्यादातर प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले श्रीलंकाई रुपये का अवमूल्यन शुरु हो गया। विशेष रूप से, यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमज़ोर हुआ और 198.46 रुपये (30 मई 2021 को) के स्तर पर पहुँच गया, यह इतिहास में अब तक के सबसे बड़े अवमूल्यन में से एक था [vii] । रुपये के वर्तमान अवमूल्यन ने अनिवार्य रूप से देश के आयात खर्च में वृद्धि की और परिणामस्वरूप इसका विदेशी ऋण बोझ बढ़ गया।

इस विदेशी मुद्रा संकट का एक अन्य कारण देश का अपनी आवश्यक वस्तुओं के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता भी है। श्रीलंका दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं जैसे चीनी, दालें, अनाज और दवाओं के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है और इस स्थिति में देश अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा है, भोजन की कमी भी है। सरकार द्वारा जैविक खेती करने और रसायानिक उर्वरकों के प्रयोग पर रोक लगाने के अचानक किए गए फैसले से घरेलू खाद्य उत्पादन में भारी गिरावट आई और खाद्य मूल्य में बहुत अधिक वृद्धि हुई।

उपरोक्त सभी कारकों ने श्रीलंका को गंभीर विदेशी मुद्रा संकट में डाल दिया है। अब वह ऐसी स्थिति में है जहां सरकार के लिए आपातस्थिति से बाहर निकलने के लिए दूसरे देशों से मदद लेना अनिवार्य हो गया है। देखना यह होगा कि अब श्रीलंका की सरकार क्या कदम उठाती है।

*डॉ. राहुल नाथ चौधरी, रिसर्च फेलो, इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।

डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।

[i] Central Bank of Sri Lanka.

[iv] Deyshappriya, N R Ravindra. (17 Jul, 2021). Covid 19 and the Sri Lankan Economy. Engage-Economic and Political Weekly. Vol. 56, Issue No. 29

[v] Gunadasa, S (2020): Sri Lankan Government Responds to COVID-19 by Mobilising the Military and Helping the Financial Elite. World Socialist Website, Available at: https://www.wsws.org/en/articles/2020/03/18/sril-m18.html. Accessed on10.9.2021

[vi] Nirupama Subramanian (Sep. 9,2021) Explained: The perfect storm that has led to Sri Lanka’s national ‘food emergency’. Indian Express. Available at: https://indianexpress.com/article/explained/sri-lanka-food-emergency-debt-burden-7496044/ Accessed on: 10.9.2021

[vii] Deyshappriya, N R Ravindra. (17 Jul, 2021). Covid 19 and the Sri Lankan Economy. Engage-Economic and Political Weekly. Vol. 56, Issue No. 29

और कितना रुलाएगा डॉलर?

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बहुत खामोशी है उदारीकरण के पैरोकारों और रुपए के अवमूल्यन में अनेक गुण देखने वाले अर्थशास्त्रियों में। डॉलर जब 79.37 रुपए का हो गया और रिजर्व बैंक की सारी कवायद के बाद भी अगले दिन मात्र चार पैसे सुधर पाया तो कोई भी ऐसा अर्थशास्त्री सामने नहीं आया जो रुपए के अवमूल्यन को निर्यात बढाने और जीडीपी बढने में योगदान का तर्क दे रहा था। डॉलर को चालीस रुपए पर लाने की बात करने वाले तो अब इस सवाल को छूने से भी बचने लगे हैं।

उधर बाजार के जानकार हाल फिलहाल डॉलर के 82 रुपए तक पहुंचने की भविष्यवाणी करने लगे हैं। अभी करोना के समय से ही डॉलर दो रुपए से ज्यादा महंगा हुआ है जबकि इस बीच खुद अमेरिका परेशानी में रहा है और उसके यहां भी डॉलर के भविष्य को लेकर तरह-तरह की चर्चा चलती रही है। अब यह कहने में हर्ज नहीं है कि किसी भी देश की मुद्रा की कीमत वहां की अर्थव्यवस्था की स्थिति और आर्थिक प्रतिष्ठा को बताती है और इस बुनियादी पैमाने पर हमारी स्थिति दिन ब दिन कमजोर होती दिखती है।

यह खबर ज्यादा प्रचारित नहीं हुई है कि बीते कुछ समय से हमारा रिजर्व बैंक डॉलर की बढत को थामने के लिए अपनी अंटी से काफी रकम खर्च कर रहा है। प्रसिद्ध वित्तीय संस्था बर्कले की रिपोर्ट है कि पिछले पांच महीने में रिजर्व बैंक ने डॉलर को थामने के लिए अपने पास से 41 अरब डॉलर बाजार में उतारे हैं। सौभाग्य से अभी तक देश के विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति अच्छी है।

बर्कले का अनुमान है कि रिजर्व बैंक ने वायदा और हाजिर, दोनों बाजारों में रेट रोकने में यह पैसा लगाया है। पर रिजर्व बैंक की भी अपनी सीमा है और जोर जबरदस्ती से रेट थामना बाजार में बहुत लम्बे समय तक कारगर नहीं हो सकता।

वित्त मंत्री ने भी देसी तेल कम्पनियों के बाहर तेल बेचने पर (हालांकि यह पुराने करार का उल्लंघन है) पर ‘विंडफाल टैक्स’ और सोने के आयात को महंगा करके अपनी तरफ से रुपए क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? को मजबूती देने की कोशिश की है लेकिन इतने से विदेश व्यापार का घाटा पटेगा या मैनेज होने लायक रहेगा यह कहना मुश्किल है।

यह बात तब और सही लगती है जब हम देखते हैं कि जून में समाप्त तिमाही में हमारा विदेश व्यापार का घाटा रिकार्ड बना चुका है और आगे चीजें और बिगडती लग रही हैं। अमेरिका समेत सारे युरोप में संकट दिखने से हमारे सामान की मांग बढने की गुंजाइश नहीं दिखती और इधर आयात बेहिसाब बढता जा रहा है। सिर्फ पहली तिमाही का विदेश व्यापार का घाटा 70.25 अरब डॉलर का हो गया है।

कहना न होगा कि इसमें पेट्रोलियम आयात का बिल सबसे बडा है जबकि हम रूस से सस्ता तेल लेने का नाटक भी चलाते रहे हैं। सिर्फ तेल का बिल हमारे जीडीपी के पांच फीसदी तक आ चुका है और वह भी अस्सी डॉलर प्रति बैरल के हिसाब पर। इस साल तो कीमतें कभी भी इस स्तर से नीचे नहीं आई हैं सो इस बार आयात का बिल और बडा होगा।

 - Satya Hindi

सोने का आयात भी बेहिसाब बढा है जिसके चलते वित्त मंत्री ने कर बढाए हैं। इसी तरह कोयले का आयात भी बहुत बढा है। अब मुश्किल यह है कि हम ऊर्जा के मामले में बहुत सख्ती करेंगे तो उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था और सारे उत्पादन पर पडेगा। पर असली समस्या तैयार सामान, खासकर सिले कपडों से लेकर जेम-ज्वेलरी तक, का निर्यात कम होने से है। अमेरिका और युरोपीय संघ, दोनों जगह से मांग गिरी है। एक कारण यह भी है कि दूसरे देश हमसे सस्ता माल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच रहे हैं। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे मुल्कों में सस्ते श्रम के चलते सस्ता उत्पादन होता है। उधर, चीनी सामान भारतीय बाजार में अटे पड़े हैं।

जानकार, इससे भी ज्यादा दो चीजों को लेकर डरे हैं। अभी भी फ़ेडरल रिजर्व अपने यहां बैंक रेट बढाने वाला है जिसकी आशंका से पहले ही दुनिया भर के बाजारों के प्राण सूखे हुए हैं। हमारे यहां से भी बडी मात्रा में विदेशी पूंजी बाहर वापस हुई है-शेयर बाजारों की गिरावट उसका प्रमाण है। अर्थव्यवस्था में पूंजी का अभाव असली चोट है जो सेंसेक्स गिरने-चढने की तरह तत्काल नहीं दिखती। दूसरी चीज है विदेशी कर्ज की अदायगी का समय पास आना।

यह अनुमान है कि देश पर 621 अरब डॉलर का जो विदेशी कर्ज है उसमें से 267 अरब डॉलर की रकम अब अगले महीने में मैच्योर हो जाएगी अर्थात उसकी अदायगी करनी होगी। अगर 267 अरब डॉलर की जरूरत होगी या इतनी रकम बाहर जाएगी तो हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में जबरदस्त कमी हो सकती है (लगभग 43-44 फीसदी) और तब बाजार में डॉलर की मांग भी ज्यादा रहेगी।

अर्थव्यवस्था में जान आने से ही इस मुसीबत से छुटकारा मिल सकता है। निर्यात की कमाई बढ़ेगी तो संकट कम होगा। अभी जब दुनिया भर में गेहूं और अनाज की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है और हमारा गेहूं पहली बार बाहर लाभकारी दाम पर बिकने की स्थिति में आया है तब सरकार ने निर्यात पर रोक लगा दी। सरकारी गोदामों में छह करोड टन गेहूं का भंडार है लेकिन उसने अच्छी फसल देखने के बाद भी यह कदम उठाया। कई और कृषि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगी है।

इस बार मुनाफे की आस में खुली मंडियों में काफी गेहूं निजी कंपनियों ने खरीदा है। लिहाज़ा इस क्या विदेशी मुद्रा में पैसे खर्च होते हैं? बार सरकारी खरीद केन्द्रों पर कम आया है। सिर्फ मेक इन इंडिया का नारा लगा है काम चीन से माल मंगाने या उससे पुर्जे मंगाकर जोडने का हुआ है। इन जुमलों का हिसाब भी होना चाहिए और चालीस रुपए के डॉलर का भी।

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