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परिसंपत्ति संरचना का विश्लेषण

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हालांकि इन सुधारों ने विनियामक और करों की बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है, जो वर्तमान में भारत में इन संरचनाओं को बेदखल कर रहे हैं, निवेशकों का आत्मविश्वाससेट-अप चरण में सड़ने वाले आरईआईटी और / या इनवीट्स के लिए अधिकांश प्रस्तावों के साथ, पर्याप्तता में वृद्धि और लाभप्रदता काफी नहीं बढ़ी है।

गैर निष्पादित परिसंपत्ति : भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक अभिशाप

जब ऋण लेने वाला व्यक्ति 90 दिनों तक ब्याज या मूलधन का भुगतान करने में विफल रहता है तो उसको दिया गया ऋण गैर निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन– परफॉर्मिंग असेट) माना जाता है.

गैर निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन–परफॉर्मिंग असेट) क्या है?

गैर निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन–परफॉर्मिंग असेट) वित्तीय संस्थानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला वर्गीकरण है जिसका सीधा सम्बन्ध कर्ज/ ऋण/ लोन न चुकाने से होता है. जब ऋण लेने वाला व्यक्ति 90 दिनों तक ब्याज या मूलधन का भुगतान करने में विफल रहता है तो उसको दिया गया ऋण गैर निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन– परफॉर्मिंग असेट) माना जाता है.

आम शब्दों में एनपीए वैसी संपत्तियां/ परियोजना होती हैं जो मूल रूप से परिकल्पित अवधि और अपनी सीमा तक नकद प्रवाह नहीं बनाती. अंतरण द्वारा बैंक दिए गए ऋण की पूरी मात्रा को समय से पुनर्प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता है, इसलिए इसकी व्यवस्था करता है. हालांकि वास्तविक दुनिया में एनपीए वास्तविक कारणों, गलत अनुमानों/ अक्षमताओं और गलत काम की वजह से पैदा होता है.

गैर निष्पादित परिसंपत्ति का परिमाण

एक सर्वेक्षण के अनुसार बैंकिंग प्रणाली में शुद्ध एनपीए कुल ऋण का सिर्फ 2.36% ही है. हालांकि पुनर्गठित परिसंपत्तियों को ध्यान में रखें तो स्ट्रेस्ड असेट अकाउंट प्रणाली में कुल ऋण का 10.9% होगा.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार भारत में कुल ऋण का करीब 37 फीसदी खतरे में है.

रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2015–16 की तीसरी तिमाही में भारत की सबसे बड़े ऋणदाता भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के समेकित शुद्ध लाभ में 67% की भारी गिरावट आई और यह 1259.49 करोड़ रुपये था. साथ ही 20692 करोड़ रुपयों का वर्गीकृत ऋण खराब ऋण की श्रेणी में चला गया.

अनुमान के अनुसार एसबीआई और उसकी सहयोगी बैंकों समेत 24 सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल संचयी एनपीए, 31 दिसंबर 2015 को 393035 करोड़ रुपये था.

आर्थिक सर्वेक्षण 2015–16 ने बैंकों के बढ़ते दोषपूर्ण ऋण और भविष्य में विकास की संभावनाओं को खराब करने की उनकी क्षमता के बारे में नीति निर्माताओं को सचेत किया.

गैर निष्पादित संपत्तियों की बढ़ती प्रवृत्ति का कारण

वास्तविक दुनिया में एनपीए वास्तविक कारणों, गलत अनुमानों/ अक्षमताओं और गलत काम से पैदा होता है. कारणों को बाहरी माहौल और आंतरिक माहौल में वर्गीकृत किया जा सकता है.

बाहरी माहौल में वैश्विक मंदी, घरेलू मांग में कमी, नीति संबंधि गतिरोध और विवादित अनुबंध शामिल हैं.

बैंकः सरकारी घाटा, खराब ऋण मूल्यांकन, कमजोर जोखिम प्रबंधन, पूर्ण ऋण– कोई इक्विटी नहीं, इंफ्रा वित्तपोषण खासकर राजमार्ग– 'गोल्ड प्लेटेड' अनुबंध, पावर–फॉल्ट एफएसए, व्यवस्था के माध्यम से गुजरना, भुगतान को समाप्त करना, त्वरित विकास का पीछा करना, बहाना बनाना और विस्तार आदि शामिल हैं.

कॉरपोरेट इंडिया : जटिल वेब होल्डिंग कंपनी, स्टेप डाउन एनटीटीज, अधिक लाभ उठाना, विदेशों में अधिग्रहण, बिना हिचक के पहुंच, अपनाना, बदलाव और ऐसे ही अन्य कारण

बिक्री मूल्य बनाम संकटपूर्ण बिक्री : मिन्स्की फाइनैंशियल इनस्टेबिलिटी हाइपोथिसिस– तीन प्रकार के उधारकर्ता ( हेज, सट्टा और पोंजी)

कॉरपोरेट जगत के बाहर : किसान क्रेडिट कार्ड और कृषि संकट के प्रतिकूल फसल बीमा, छोटे/ मझोले उद्यम …..समय पर समर्थन में कमी और भुगतान में देरी.

गैर निष्पादित संपत्तियों की बढ़ती प्रवृत्ति का प्रभाव

• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उद्योगों को 80% ऋण देते हैं और ऋण वितरण का यह हिस्सा एनपीए का बड़ा हिस्सा बनता है. पिछले वर्ष जब किंगफिशर वित्तीय संकट से जूझ रहा था, एसबीआई ने इससे उबरने के लिए किंगफिशर को बहुत अधिक ऋण दिया था.
• अगर भारतीय उद्योग संकट में है तो वह बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित करेगा और उनका एनपीए बढेगा.
• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ही इसके लिए दोषी नहीं माना जा सकता. बैंकिंग उद्योग की वर्तमान स्थिति के लिए सरकार की परिसंपत्ति संरचना का विश्लेषण आर्थिक नीति और राजनेता– कॉरपोरेट का गठबंधन भी इसके लिए जिम्मेदार है.
• अगर कोटक महिन्द्रा या यूनियन बैंक जैसे बैंकों के एनपीए का वर्तमान स्थिति में बढ़ना जारी रहता है तो यह बैंक को बंद करवा सकता है और यह देश में बेहद गंभीर आर्थिक संकट भी पैदा कर सकता है.
• एनपीए के बढ़ने का एक मुख्य कारण कॉरपोरेट घरानों को बिना उनकी वित्तीय स्थिति और साख रेटिंग का उचित मूल्यांकन किए उन्हें दिए जाने वाले ऋण के नियमों में ढील देना है. साथ ही प्रतिस्पर्धा में बैंक बड़े पैमाने पर असुरक्षित ऋण दे रहे हैं जो एनपीए के स्तर को बढ़ाने में योगदान करता है.
• वैश्विक अर्थव्यवस्था बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित करता है लेकिन बहुत कम. आरबीआई और सरकार की नीतियां स्थिति में सुधार ला सकती हैं.
• अगर बैंकों में एनपीए की स्थिति पर नियंत्रण नहीं प्राप्त किया गया तो बैंक दिवालिया हो सकते हैं. अर्थव्यवस्था की पूरी ऋण वितरण संरचना खत्म हो सकती है और देश प्रमुख वित्तीय संकट से जूझ सकता है.
• जब अमेरिका में सबप्राइम संकट आया था, इसकी वजह उदार ऋण मानदंड थे और बैंकों के पास ऋण न चुका पानों वाली की संख्या बहुत अधिक थी. बड़े बैंक दिवालिया हो गए थे और अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ गई थी. इसलिए एनपीए की समस्या को गंभीरता से लिया जा रहा है.
आरबीआई द्वारा उठाए गए कदम
• आरबीआई ने सुझाव दिया है कि उधारदाताओं का सभी मामलों में उनका स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ साख मूल्यांकन (ऑब्जेक्टिव क्रेडिट अप्रेजल) करना चाहिए और बाहरी परामर्शदाताओं, खासकर उधारलेने वाली कंपनी के परामर्शदाताओं द्वारा तैयार क्रेडिट अप्रेजल रिपोर्टों पर निर्भर नहीं होना चाहिए.
• बैंकों/ उधारदाताओं को खासतौर पर संरचनात्मक परियोजनाओं के लिए सेंसेटिव टेस्ट्स/ सिनैरियो एनालिसिस करना चाहिए जिसमें परियोजना की देरी और लागत में बढ़ोतरी भी शामिल होनी चाहिए. यह करेक्टिव एक्शन प्लान (सीएपी) पर फैसला करते समय परियोजना की व्यवहार्यता पर विचार बनाने में मदद करेगा.
• आरबीआई ने यह सुझाव भी दिया कि असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (एआरसी) को स्ट्रेस्ड असेट के लिए समर्थित प्रणाली के तौर पर बनाना चाहिए न कि बैंकों द्वारा एनपीए के निपटान हेतु अंतिम उपाय के तौर पर. परिसंपत्ति के पुनरुद्धार के अच्छे मौके के समय एआरसी को परिसंपत्ति की बिक्री और पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण के लिए वसूली योग्य मूल्य की उचित मात्रा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
• आरबीआई बैंकों को उनके मंजूर आंतरिक नीति के अनुसार एनपीए के बिक्री के समय कंपनी/ दोषी ऋणलेने वाले के प्रमोटरों की पूर्व अनुमति लिए बगैर एक्सलरेटेड प्रोविजनिंग/ एडिशनल प्रोविजंस पर फ्लोटिंग प्रोविजंस को प्रोत्साहित करेगी और उसे सीधे/ परोक्ष रूप से एआरसी से संपत्ति वापस खरीदने से मना किया जाएगा. आरबीआई ने संभावित कानूनी मुद्दों पर गौर करने और उसे संबोधित करने का प्रस्ताव दिया है.

खाराब ऋण मामलों की जल्द पहचान और उसके समाधान के लिए आरबीआई की कार्य योजना

• जिन उधारकर्ताओं की ऋण पात्रता पर संदेह है उनके लिए महंगा कर्ज
• ऋण पुनर्गठन योजना जो पहले 180 दिनों में तैयार की जाती थी उसे 17– 100 दिनों के भीतर तैयार करना.
• 30–60 दिनों की भुगतान देरी पर ट्रिगर एक्शन, पहले यह 90 दिनों के बाद किया जाता था.
• 100 करोड़ रुपये या अधिक का कर्ज लेने वाले बड़े उधारकर्ताओं के लिए संयुक्त उधारदाता मंच.
• SARFESI ( स्क्रूटिनाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनैंशियल असेट एंड इंफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंट्रेस्ट एक्ट) के मामलों के जल्द निपटान के लिए विशेष पीठों की स्थापना.

सेबी का उद्योग निहितार्थ बैंकों को आरईआईटी और इनवीट्स में निवेश करने की अनुमति देता है: एक विश्लेषण

सेबी (रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट्स) विनियमों और सेबी (इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) विनियमों की शुरुआत के बाद से 2014 में, बाजार नियामक और भारत सरकार ने आरईआईटी की स्थापना शुरू करने के लिए कई सुधार शुरू किए हैं और भारत में आमंत्रण।

हालांकि इन सुधारों ने विनियामक और करों की बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है, जो वर्तमान में भारत में इन संरचनाओं को बेदखल कर रहे हैं, निवेशकों का आत्मविश्वाससेट-अप चरण में सड़ने वाले आरईआईटी और / या इनवीट्स के लिए अधिकांश प्रस्तावों के साथ, पर्याप्तता में वृद्धि और लाभप्रदता काफी नहीं बढ़ी है।

इस मुद्दे से निपटने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई), सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) द्वारा अनुरोध किए जाने पर, वित्त वर्ष 2017-18 की अपनी पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति में, ने घोषणा की कि बैंक को REITs और INVITs में निवेश करने की अनुमति होगी। आरईआईटी और इनवीट्स में बैंकों द्वारा निवेश 20% की सीमा के अधीन होगाउनके नेट स्वाधिकृत निधि यह एक छाता की सीमा है और इसलिए, इक्विटी-लिंक्ड म्यूचुअल फंड, उद्यम पूंजी निधि और इक्विटी और अब, आरईआईटी और इनवीट जैसे परिसंपत्ति वर्गों में बैंकों द्वारा निवेश के लिए एक समग्र टोपी के रूप में कार्य करता है। आरबीआई ने कहा है कि विस्तृत दिशानिर्देश मई 2017 में अनावरण किए जाएंगे।

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Business Valuation- बिजनेस वैल्युएशन

बिजनेस वैल्युएशन क्या होती है?
बिजनेस वैल्युएशन (Business Valuation) किसी संपूर्ण व्यवसाय या कंपनी यूनिट के आर्थिक मूल्य के निर्धारण की एक सामान्य प्रक्रिया है। बिजनेस वैल्युएशन अर्थात व्यवसाय मूल्यांकन का उपयोग सेल वैल्यू, पार्टनर ओनरशिप की स्थापना, टैक्सेशन या यहां तक कि अलगाव कार्यवाहियों सहित कई कारणों से बिजनेस के उचित मूल्य का निर्धारण करने के लिए किया जा सकता है। ओनर व्यवसायों के मूल्य के वस्तुपरक आकलन के लिए अक्सर प्रोफेशनल बिजनेस इवैल्युएटर्स की सेवा लेते हैं। किसी बिजनेस के मूल्यांकन के लिए कई पद्धतियों का उपयोग किया जाता है जैसे मार्केट कैप, अर्निंग्स मल्टीप्लायर्स या बुक वैल्यू। वैल्युएशन टैक्स रिपोर्टिंग के लिए भी महत्वपूर्ण होती है।

बिजनेस वैल्युएशन की मूल बातें
बिजनेस वैल्युएशन के विषय पर कॉरपोरेट फाइनेंस में अक्सर चर्चा की जाती है। आम तौर पर बिजनेस वैल्युएशन तब किया जाता है जब कंपनी अपने पूरे कामकाज या उसके एक हिस्से को बेचने या किसी दूसरी कंपनी के साथ विलय करने या उसे खरीदने की योजना बना रही होती है। किसी बिजनेस का वैल्युएशन वस्तुपरक उपायों का उपयोग करते हुए किसी व्यवसाय के वर्तमान मूल्य और व्यवसाय के सभी पहलुओं को निर्धारित करने की प्रक्रिया है। किसी बिजनेस वैल्युएशन में कंपनी के प्रबंधन, उसकी पूंजी संरचना, भविष्य में उसकी आय की संभावना या उसकी परिसंपत्तियों की मार्केट वैल्यू का विश्लेषण शामिल हो सकता है। वैल्युएशन के लिए उपयोग में लाए गए टूल्स मूल्यांकनकर्ताओं, व्यवसायों और उद्योगों में अलग अलग हो सकते हैं। बिजनेस वैल्युएशन के समान दृष्टिकोणों में वित्तीय विवरणों, डिस्काउंटिंग कैश फ्लो मॉडल्स और इसी प्रकार की कंपनी तुलनाएं शामिल हो सकती हैं।

बिजनेस वैल्युएशन का महत्व
बिजनेस वैल्युएशन टैक्स रिपोर्टिंग के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है। इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) के लिए आवश्यक होता है कि किसी व्यवसाय का मूल्यांकन उसके उचित बाजार मूल्य पर आधारित हो। बिक्री, खरीद या किसी कंपनी के शेयरों को उपहारस्वरूप देने जैसे टैक्स दिए जाने वाले मसले वैल्युएशन पर निर्भर करेंगे। बिजनेस वैल्युएशन के तरीकों में प्रमुख हैं- मार्केट कैपिटलाइजेशन, टाइम्स रेवेन्यू पद्धति, अर्निंग्स मल्टीप्लायर, डिस्काउंटिंग कैश फ्लो (डीसीएफ) पद्धति, बुक वैल्यू, लिक्विडेशन वैल्यू, रिप्लेसमेंट वैल्यू, ब्रेकअप वैल्यू, एसेट आधारित वैल्यू आदि। इनमें मार्केट कैपिटलाइजेशन बिजनेस वैल्युएशन का सरल तरीका माना जाता है।

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