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दलाल कैसे बने

दलाल कैसे बने
उनके साथ होने का कुछ काल्पनिक कहानियाँ गढ ले, अब भले ही हकीकत में वे आपको अपने दरबान से भी ज्यादा हिराकत भरी नजरों से देखें लेकिन बेफिक्र होकर अपना गुणगान करते हैं क्यो कि गहराई में जाकर सच्चाई पता करने की फुर्सत किसे होती है? सामने वाले शख्सियत को भी अपना भौकाल बनाए रखने के लिए भी भीड की जरूर होती है,ऐसे मे आप की इज्जत बनते हुए बच जाती है।

પ્રહલાદ પ્રજાપતિ

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माफियाओं की रखैल मीडिया

माफियाओं की रखैल मीडिया
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#Mafia_Mistress .
माफियाओं की रखैल मीडिया . #खाजतकिया_आइटम Anjana Om Kashyap . & #सूअर Ravish Kumar on NDTV

कांग्रेस ने जब गुजरात और मोदी की इमेज खराब करने के लिए दो चैनेलो आज तक और एनडीटीवी को चार चार करोड़ रूपये देकर पेड न्यूज़ और पेड कवरेज के लिए चुना तो उसे ऐसे एंकर चाहिए था जिसकी शक्ल से ही नीचता और मक्कारी टपकती हो … इसलिए कांग्रेस ने अंजना ओम कश्यप और रविश कुमार को इसके लिए चुना |

अंजना ओम कश्यप गोधरा में रुकी थी तब उसको दलाल कैसे बने पूरी लिखित स्टोरी कांग्रेसी नेताओ ने दी ..जो जावेद अख्तर के द्वारा लिखा गया था … फिर लगातार गोधरा से लेकर अहमदाबाद तक तीन दिनों तक अंजना ओम कश्यप ने एक तरफा रिपोर्टिग की … कहते है न की शयाना कौवे की नजर सिर्फ टट्टी पर होती है ..उसी तरह ये दोनों एंकर पुरे गुजरात की सिर्फ नकारात्मक छवि पेशकरके रिपोर्टिंग किये |

लेकिन कल इसी “खाजतक” चैनल पर एंकर अंजना ओम कश्यप और बिकाऊ पत्रकारिता के स्टेटस सिंबल “एनडीटीवी” के तथाकथित “दलाल” (समानार्थी शब्द पत्रकार) रविश कुमार जी के अनुसार मुज़फ्फरनगर के दंगे मामूली सी बात (लड़की से छेड़खानी फिर रेप की कोशिश ) पर हुए जिसको सियासी लोगों ने अपने फायदे के लिए और भड़काया।

अब देखों दोस्तों ये वही “अंजना ओम कश्यप” है जो “दामिनी” बलात्कार काण्ड के बाद एक दिन रिपोर्टिंग कर रही थी तो कुछ लोगों ने इसकी शक्ल और बाजारू टाइप मेकअप देखकर “बिकाऊ” समझकर छेड़ दिया था तो इसने अगले 2 दिनो तक इस घटना को पूरे देश के मर्दों की घटिया सोच बताया था और खुद को छेड़ने की घटना को बहुत गंभीर बताया था और आज जब दूसरों पे बीती तो इसे “मामूली” बात बता रही है….. और इन रविश जी का तो क्या कहना. मेरे ख्याल से अगर ये “पत्रकार से दलाल कैसे बने” नाम की कोई पुस्तक लिखें तो “बुकर” पुरस्कार के असली हक़दार ये ही हैं। ये ज़नाब महिलाओं की सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं पर आज चंद नोटों की गड्डियों की खातिर किसी लड़की से छेड़खानी की घटना को मामूली सी बात बता रहे हैं। ये लोग “महापंचायत” के बुलाने का रोना तो रो रहे हैं पर “महापंचायत” क्यूँ बुलाई गयी इसका कारण नही बता रहे। और अंत में यही कहना चाहूँगा की अगर किसी लड़की से छेड़छाड़ करना”मामूली सी बात” है तो इन लोगों को पत्रकारिता छोड़ कर अपने असली पेशे “दलाली पर ही उतर आना चाहिए

छुट भईया नेता या समाजसेवी कैसे बने?

डॉ.धीरज फुलमती सिंह

व्यंग

मुबंई: छुट भईया नेता और समाज सेवक इंसानो की यह वह नश्ल है,जो हर गली,नुक्कड,चौराहे पर आपको आसानी से घूमती नजर आ जाएगी। कभी किसी चाय की टपरी पर तो कभी पान की बखाड पर झक्क सस्ते सफ़ेद कुर्ते मे खडे हुए नजर आ जाता है। ये शहर मे भी मिलते हैं और गांव में भी पाए जाते हैं। ये हर जगह उपलब्ध होते हैं।

The perks Indian political class enjoys includes a house, on the .

छुट भईये नेताओ और समाज सेवकों की जमात में शामिल होना है तो अपने चेले-चपाटों को जमा करें। चेले चपाटे कहां से मिलेंगे, इस बात के लिए निश्चित रहे,भारत मे बहुत बेकारी और बेरोजगारी है, आसानी से मिल जाएगे।फिर किसी सस्ते,सुंदर, टिकाऊ से दलाल तमीज की भाषा मे जिसे “सलाहकार- कंस्लटेंट” कहते हैं,को पकड कर सबसे पहले एक सामाजिक संस्था बना लें।

खुद उस संस्था का अध्यक्ष बन जाए, अपनी पत्नी या पति,भाई को सचीव बना लें। उसके कुछ कार्ड छपवा लिजिए, जिस पर आप का तकल्लुफ राष्ट्रीय अध्यक्ष लिखा हो,अब भले ही आपको पड़ोसी जानता न हो, भाव न देता हो वैसे भी कोई पड़ोसी किसी को भाव देते कहा है?

इस बात की जरा सी भी चिंता न करें,लेकिन हर जगह अपने को राष्ट्रीय अध्यक्ष जताने की कोशिश मे लगे रहे। चेले चपाटो को हडकाए रहें,उनमे भौकाल बनाए रहे। सभी राष्ट्रीय अध्यक्ष यही करते हैं। निश्चित रहे, आप भी कोई अलग और दलाल कैसे बने अजूबा नही कर रहे हैं। भले ही आप की सामाजिक संस्था मे कुल मिलाकर वही गिनती के दो चार सदस्य हो,कोई और न हो लेकिन विजिटिंग कार्ड पर हमेशा अपने नाम के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष लिखवाए, ऐसा करने से भौकाल अच्छा बनता है।

किसी प्रिटींग प्रेस वाले को धर कर समय समय पर अपने ही पैसे से अपना फोटो लगा बैनर बनवा लिया करें, दलाल कैसे बने पैसे कम पडे तो अपने चेलों चपाटों को उनका भी फोटो चस्पां करने का लालच देकर कॉट्रिब्यूशन मे पैसे इकट्ठा करें। हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा। लो बन गये, लोकल लिडर। उसके बाद समय बे समय बडी-बडी हस्तियों से अच्छे और वयक्तिगत संबंध होने का गुणगान करते हैं।

उनके साथ होने का कुछ काल्पनिक कहानियाँ गढ ले, अब भले ही हकीकत में वे आपको अपने दरबान से भी ज्यादा हिराकत भरी नजरों से देखें लेकिन बेफिक्र होकर अपना गुणगान करते हैं क्यो कि गहराई में जाकर सच्चाई पता करने की फुर्सत किसे होती है? सामने वाले शख्सियत को भी अपना भौकाल बनाए रखने के लिए भी भीड की जरूर होती है,ऐसे मे आप की इज्जत बनते हुए बच जाती है।

अपने जन्म दिन पर एक सौ- देढ सौ रूपये का गुलदस्ता और साथ मे सत्तर अस्सी रूपये का एक शाल खरीद ले। कई बार कुछ मूर्ख किसीम के लोग आपकी नजरों में चढने के लिए खुद ही सौ पचास का गुलदस्ता भेट करने लग जाते हैं। ऐसे लोग हर समाज में मिल जाते हैं, ईश्वर बहुत दयालु है, उसने ऐसे बहुत से लोगो को बनाया है। फिर चार-आठ लोगो से लेंते-देते फोटो खिंचवाने और उसी को अपने फेसबुक और वाट्सअप समूह में बांट दे, भेज दें। फिर अपने चेले चमचों से अपनी तारीफ के पुलिंदे बंधवा ले। फिर देखिएगा देश की बडी बडी हस्तियां भी आपके आगे पानी भरते नजर आएंगे। ये चेले चमचे समां बांधने मे बडे माहिर होते हैं।

बडे-बडे नेताओं के साथ हमेशा फोटो खिचते- खिंचवाते रहे। नेता आपको जानता हो दलाल कैसे बने या नही,फिकर नॉट लेकिन सोशल मीडिया पर उनके जन्म दिन की शुभेच्छा देते रहे,ऐसा करने से आस पास के लोगो और इलाके में रुतबा बढता है।

जैसे ही कोई चुनाव नजदीक आए,लोगो को कहना शुरु कर दिजिए कि आप चुनाव लड़ने के जरा भी इच्छुक नही है,अब भले ही अंदर से चुनाव लड़ने की इच्छा जोर मार रही हो, ऐसा कहने से लोगो मे जिज्ञासा पैदा होती है फिर धीरे से,पीछे से अपने चमचों को सोशल मीडिया पर अपनी मुनादी करवाने के लिए कहिए कि आप भावी विधायक, पार्षद है। आपकी अपनी बात भी रह जाएगी और बेइज्जती भी नही होगी । भले ही चुनाव के वक्त कोई पार्टी आपको घास भी न डालें लेकिन तब तक इलाके में भौकाल तो बन ही जाता है।

साल मे एकाध बार लिट्टी चोखा, फाफडा जलेबी की पार्टी जरूर दे,ज्यादा क़रीबी लोगों को मटन मछली की खैरात एक बार दे दे। इसमे पैसे ज्यादा खर्च नही होते लेकिन भौकाल बहुत दलाल कैसे बने बनता है। एक बात और स्थानिय नकली पत्रकारों को पकड कर रखें,इनकी कीमत ज्यादा नही होती है, ये दो-ढाई सौ रुपये मे हमेशा बिकने को तैयार रहते हैं, ऐसे बहुत से तथाकथित नकली पत्रकार आपको अपने इलाके में आसानी से मिल जाएगे।

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पुलिस स्टेशनों,सरकारी दफ्तरों मे अपने आस पास के लोगो का काम करवाते रहें,लोग आप से खुश रहेंगे मगर पीछे से अपना कमीशन लेना न भूलें। आखिर समाज सेवकी और नेतागिरी भी तो चमकानी है, बिना कमीशन के पैसो के काम कैसे चलेगा भला ? अगर काम नहीं भी कर सके तो कोई बात नहीं है, बस बंदर की तरह इधर उधर उछलते कूदते रहे ताकि लोगो को लगे कि आप काम करने की कोशिश मे लगे हैं जैसे वो दिल्ली का मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हमेशा करते रहता है। बस बिलकुल वैसे ही एक्टिग करते रहना है।

और हाँ, काम हो या ना हो, फोटो खिंचवाना न भूले। ये फोटो सोशल मीडिया पर हमेशा चेंपते रहें। ऐसे फोटो आपका भौकाल बनाने मे हमेशा काम आते हैं।….लो जी आप तो समाज सेवा मे नेता बन गये। कितना आसान है ना,छुट भईया समाज सेवक और नेता बनना?

जय हिंद

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Ranchi : मानव तस्करी के शिकार झारखंड के 14 बच्चों को दिल्ली में कराया गया मुक्त

Ranchi: 14 children of Jharkhand, victims of human trafficking, were freed in Delhi

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के सार्थक प्रयास से लगातार मानव तस्करी के शिकार बालक/बालिकाओं को मुक्त कराकर उनके घरों में पुनर्वास किया जा रहा है। उसी कड़ी में मानव तस्करी के शिकार झारखंड के साहेबगंज जिले के 3 बालक एवं 11 बालिकाओं को दिल्ली में मुक्त कराया गया है।

रेड लाइट एरिया में ले जाकर बेच दिया

इन बच्चों से काउंसेलिंग के दौरान यह पता चला कि रेखा (काल्पनिक नाम) नाम की एक 12 वर्षीय बच्ची को उसके गांव के एक व्यक्ति ने अपहरण कर एक वर्ष पूर्व दिल्ली लाकर एक साल तक दिल्ली के विभिन्न इलाकों की कोठियों में घरेलू कार्य हेतु लगाया। इसका बच्ची द्वारा विरोध करने पर उसे रेड लाइट एरिया में ले जाकर बेच दिया गया। वहां से एक दिन मौका देखकर वह खिड़की से कूदकर भाग निकली और एक ऑटो वाले की मदद से पुलिस स्टेशन पहुंच गई। पुलिस द्वारा झारखंड भवन से समन्वय स्थापित किया गया और बच्ची के घर का पता लगाया गया। बता दें कि रेखा की मां की मृत्यु हो चुकी है दलाल कैसे बने और पिता ने दूसरी शादी कर ली है। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण गांव के एक व्यक्ति द्वारा जबरन उसे दिल्ली लाया गया था।

टोल फ्री नम्बर 24 घंटे सातों दिन दलाल कैसे बने कार्य करता

मानव तस्करी पर झारखंड सरकार तथा महिला एवं बाल विकास विभाग काफी संवेदनशील है और त्वरित कार्यवाही पर विश्वास रखती है। यही कारण है कि दिल्ली में एकीकृत पुनर्वास संसाधन केंद्र चलाया जा रहा है। जिसका काम है मानव तस्करी के शिकार बच्चें एवं बच्चियों को मुक्त कराकर उनके जिलों में पुनर्वासित करना। इसका टोल फ्री नम्बर – 10582 है, जो 24 घंटे सातों दिन कार्य करता है। सचिव कृपानंद झा मानव तस्करी के मुद्दे पर काफ़ी संवेदनशील हैं। उनके द्वारा सख्त निर्देश दिया गया है कि दिल्ली एवं उसके निकटवर्ती सीमा क्षेत्र पर विशेष नजर दलाल कैसे बने रखी जाये। उसी क्रम में हमें इस बार बड़ी कामयाबी मिली। और साहेबगंज जिले के 14 बच्चों में से 09 बच्चों को दिल्ली पुलिस के सहयोग से दिल्ली के सीमावर्ती क्षेत्र हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश से मुक्त कराया गया है।

बता दें कि यह टीम पिछले 06 दिनों से दिल्ली में कैम्प कर आज 14 बच्चों के साथ वापस ट्रेन द्वारा झारखंड लौट रही है। जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी द्वारा यह जानकारी दि गयी कि इन सभी बच्चों को झारखंड सरकार की विभिन्न योजनाओं से जोड़ते हुए इनकी सतत् निगरानी की जाएगी, ताकि ये बच्चें दोबारा मानव तस्करी का शिकार ना होने पाएं।

दलालों के माध्यम से पलायन किये थे

दिल्ली से मुक्त कराये गए बच्चों को दलालों के माध्यम से लाया गया था। झारखंड में ऐसे दलाल बहुत सक्रिय हैं, जो छोटी बच्चियों को बहला-फुसलाकर अच्छी जिंदगी जीने का लालच देकर उन्हें दिल्ली लाते हैं और विभिन्न घरों में उन्हें काम पर लगाने के बहाने से बेच देते हैं। इससे उन्हें एक मोटी रकम प्राप्त होती है और इन बच्चियों की जिंदगी नर्क से भी बदतर बना दी जाती है। दलालों के चंगुल में बच्चों को भेजने में उनके माता-पिता की भी अहम भूमिका होती है । कई बार ऐसा देखा गया है कि बच्चे अपने माता पिता, अपने रिश्तेदारों की सहमति से ही दलालों के चंगुल में फँसकर मानव तस्करी के शिकार बन जाते हैं।

Railway - ये है देश दलाल कैसे बने की सबसे पुरानी ट्रेन, अंग्रेजों ने चलाया, आज भी यात्री करते हैं सफर

आज हम बात कर रहे हैं देश के सबसे पुरानी एक्सप्रेस ट्रेन की। यह ट्रेन है पंजाब मेल। इसकी शुरूआत एक जून 1912 को हुई थी। तब से यह लगातार पटरी (Railway Track) पर दौड़ती रही है। आइए नीचे खबर में जानते है इस ट्रेन के बारे में विस्तार से जानकारी।

Railway - ये है देश की सबसे पुरानी ट्रेन, अंग्रेजों ने चलाया, आज भी यात्री करते हैं सफर

HR Breaking News, Digital Desk- यह देश की सबसे पुरानी ट्रेन (Oldest Train) है। इसकी उम्र इसी सप्ताह 110 साल की हुई है। आप कह सकते हैं कि यह तो बूढ़ी (Old) हो गई होगी। लेकिन इसकी चाल देख लें तो आप अभी भी इस पर फिदा हो जाएंगे। निर्जन, सुनसान रास्तों पर यह ऐसे 110 किलोमीटर की रफ्तार से फर्राटा भरती है कि लोगों के मुंह से बस यही निकलता है..बेमिसाल। आइए, हम बताते हैं इस ट्रेन (Punjab Mail Train) की पूरी कहानी.

एक जून 2012 से चल रही है-


इस ट्रेन की शुरूआत 110 साल पहले एक जून 1912 को हुई थी। उस समय देश में अंग्रेजों का राज था। उस समय यह मुंबई के बंदरगाह पर स्थित बलार्ड पायर मोल स्टेशन (Ballard Pier Mole) से अविभाजित भारत के पेशावर (Peshawar) के बीच चलती थी। तब यह अकेली ट्रेन थी जो कि पेशावर से लोगों को मुंबई तक पहुंचाती थी। तब इस ट्रेन को पंजाब लिमिटेड के नाम से जाना जाता था।


शुरू में सिर्फ अंग्रेज होते थे पैसेंजर-
शुरू में इसे केवल अंग्रेज अफसरों तथा ब्रिटिश शासन के कर्मचारियों के लिए चलाया गया था। लेकिन, सन 1930 में इसमें आम जनता के लिए भी डिब्बे जोड़ दिए गए। देखा जाए तो यह ट्रेन अंग्रेज अफसरों और उनके परिवार वालों के लिए बड़ी सहायक थी। वे इंग्लैंड से पानी के जहाज के जरिए तत्कालीन बंबई बंदरगाह तक आते थे। वहां से पंजाब मेल पर सवार हो कर दिल्ली और ब्रिटिश भारत के नार्थ वेस्ट फ्रंटियर तक पहुचते थे। हालांकि, साल 1914 में इसे बंबई पोर्ट के स्टेशन से विक्टोरिया टर्मिनस Victoria Terminus स्टेशन शिफ्ट कर दिया गया। तबसे यह ट्रेन वहीं से पेशावर के लिए चलती थी।


1947 में घट गई दूरी-


साल 1947 में जब भारत को आजादी मिली तो साथ ही एक नए राष्ट्र पाकिस्तान का भी उदय हुआ। जब पाकिस्तान बना तो पेशावर पाकिस्तान में चला गया। इसके बाद पंजाब के फिरोजपुर से इसे बंबई के लिए चलाया जाने लगा। तब यह बंबई के Ballard Pier Mole station से पेशावर तक की 2496 किलोमीटर की दूरी 47 घंटे में तय करती थी। इसमें कुल छह डिब्बे थे। इनमें से तीन डिब्बों में 96 पैसेंजर बैठते थे। शेष तीन में एक डाक का डिब्बा जबकि दो में गार्ड और पार्सल होते थे।


कोयले के इंजन से तय होती थी दूरी-


शुरुआती दिनों में पंजाब मेल कोयले के इंजन से चलती थी। इसके डिब्बे लकड़ी से बने होते थे। आजादी से पहले यह पेशावर, लाहौर, अमृतसर, दिल्ली, आगरा, इटारसी के बीच 2496 किलोमीटर का सफर तय करती थी। रास्ते में इसके इंजन में कोयला और पानी भरा जाता था। साथ ही बीच बीच में गार्ड और ड्राइवर भी चेंज होते थे। उस समय यह देश की सबसे तेज चलने वाली गाड़ी मानी जाती थी।


1945 में लगाया गया एसी कोच-


पंजाब मेल ट्रेन में 1945 में पहली बार वातानुकूलित डिब्बे जोड़े गए। अभी इसमें एसी फ‌र्स्ट, एसी सेकेंड, एसी थर्ड के कुल आठ डिब्बे, 12 स्लीपर क्लास तथा चार जनरल क्लास के डिब्बे लगाए जाते हैं। यानि, इस ट्रेन में कुल कोचों की संख्या 24 होती है। अब यह ट्रेन मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से फिरोजपुर कैंट स्टेशन तक जाती है। यह करीब 1930 किलोमीटर का सफर करीब 34 घंटे में पूरा करती है। पंजाब मेल प्रसिद्ध ट्रेन फ्रंटियर मेल से भी 16 साल पुरानी है।


अब जर्मन डिब्बों में पूरा होता है सफर-


शुरू में तो इस ट्रेन में जो डिब्बे लगे थे, वह इंग्लैंड से बन कर आए थे। जब बाद में रेलवे के डिब्बे यहीं मद्रास के इंटीगरल कोच फैक्ट्री में बनने लगे तो इसमें आईसीएफ कोच लगाए गए। अब इस ट्रेन में जर्मन तकनीक से बने एलएचबी डिब्बे लगा दिए गए हैं। एलएचबी कोच लग जाने से इस ट्रेन की स्पीड बढ़ाने में तो मदद मिली ही, पैसेंजर कंफर्ट के दृष्टिकोण से भी इसमें ज्यादा सुविधा है।

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किसान भाइयो के लिए खुशखबरी: अब खाद के लिए नहीं लगेंगी लाइनें, किसानो को बुलाकर देगी खाद

हरियाणा सरकार ने राज्‍य में खाद के लिए मारामारी और इनकी कालाबाजारी समाप्‍त करने के लिए बढ़ा कदम उठाया है। इससे अब किसानों को खादों के लिए लाइनें दलाल कैसे बने नहीं लगानी नहीं पड़ेगी। अब किसानों को बुलाकर खाद दी जाएगी।

किसानों के हिस्‍से की खाद व्‍यापारी ब्‍लैक में खरीद लेते हैं

दरअसल, हरियाणा के किसानों के हिस्से का खाद व्यापारी ब्लैक में खरीद रहे हैं और बाद में मनमानी रेट पर बेचते हैं। इसके साथ ही प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में भी हरियाणा के खाद की अवैध सप्लाई हो रही है। प्रदेश सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए भविष्य में खाद की बिक्री के लिए ठीक उसी तरह का सिस्टम तैयार करने का निर्णय लिया है, जिस तरह का सिस्टम मंडी में किसान द्वारा फसल की बिक्री के दौरान अपनाया जाता है। यानी किसान को उसके फोन पर संदेश आएगा। तभी वह संबंधित पैक्स में खाद की खरीद के लिए जा सकेगा। बाकी दिनों में किसान को खाद के दलाल कैसे बने लिए कहीं लाइन में लगने की जरूरत नहीं होगी।

कृषि मंत्री जल्‍द नई स‍िस्‍टम के बारे में सीएम से करेंगे चर्चा

हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जेपी दलाल इस नए सिस्टम के बारे में जल्दी ही मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मुलाकात करेंगे। प्रदेश में पिछले साल अगस्त से नवंबर तक तीन लाख दो हजार टन खाद की खपत हुई थी। इस साल अब तक तीन लाख दस हजार टन खाद बेची जा चुकी है। राज्य सरकार के पास 27 लाख टन खाद का स्टाक उपलब्ध है। आठ कंटेनर खाद इसी माह आने हैं, जिनमें 20 हजार टन खाद पहुंचेगा। प्रदेश सरकार के पास यूरिया का ढ़ाई लाख टन का भंडार है।


केंद्रीय उर्वरक मंत्री ने उर्वरकों की उपलब्‍धता की समीक्षा की

कृषि मंत्री दलाल ने दावा किया कि प्रदेश में खाद की कमी नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों के नेता जानबूझकर सुर्खियों में बने रहने तथा भोले किसानों को लाइन में खड़े रखने के लिए षड्यंत्र रच रहे हैं। दूसरी तरफ, केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री डा. मनसुख मंडाविया ने राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ उर्वरक की उपलब्धता की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि उर्वरकों का पर्याप्त उत्पादन हो रहा है और उनकी कोई कमी नहीं है, परंतु कृषि क्षेत्र के लिए पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने को विनियर और प्लाईवुड जैसे उद्योगों में यूरिया के इस्तेमाल को सख्ती से रोकना होगा।

खाद की अवैध सप्‍लाई रोकने को पड़ोसी राज्‍यों की सीमाओं की होगी नाकेबंदी

जेपी दलाल के अनुसार, खाद की कालाबाजारी रोकने व पड़ोसी राज्यों में खाद की अवैध सप्लाई रोकने के लिए पड़ोसी राज्यों की सीमाओं पर नाकेबंदी का आदेश दिया जा चुका है। साथ ही ब्लैक में खाद बेचने वाले व्यापारियों पर कार्रवाई को लेकर अधिकारियों की ड्यूटी लगा दी गई है। विभागीय अधिकारी लगातार गोदामों और दुकानों को चेक करेंगे।


हरियाणा से पंजाब, राजस्थान और यूपी में खाद भेजने की सूचनाएं हैं। कृषि विभाग मुख्यालय लगातार जिलों पर नजर रख रहा है। दलाल ने उर्वरक कंपनियों के अधिकारियों को भी निर्देश दिए हैं कि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध करवाएं। जेपी दलाल ने कहा कि खाद की कालाबाजारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके लिए तमाम डीसी और एसपी को भी निर्देश जारी किए हैं।

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