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ट्रेडिंग क्‍या होती है?

ट्रेडिंग क्‍या होती है?

क्या होता है 'हॉर्स ट्रेडिंग' का मतलब, क्यों राजनीति में इसके हैं बहुत खास मायने

न्यूज डेस्क। कर्नाटक में भाजपा को कल बहुमत साबित करना है। भाजपा ने दावा किया है कि, वे बहुमत साबित करेंगे। अभी भाजपा के पास कुल 104 विधायक हैं। बहुमत के लिए 112 विधायकों का समर्थन चाहिए। कांग्रेस ने अपने विधायको को भाजपा से बचाने के लिए हैदराबाद के एक रिसॉर्ट में छुपाकर रखा है। वहीं भाजपा नेता विधायकों का समर्थन जुटाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच एक बार फिर 'हॉर्स ट्रेडिंग' शब्द चर्चा में आ गया है। हम बता रहे हैं ये शब्द आया कहां से और क्या होते हैं इसके मायने?

# सौदेबाजी के सेंस में होता है यूज.

- इंडिया में 'हॉर्स ट्रेडिंग' वर्ड का नॉर्मल यूज पॉलिटिक्स में किया जाता है। जब कोई सरकार फेल हो जाती है तो हॉर्स ट्रेडिंग शुरू हो जाती है। यह तब तक चलती है जब तक नई सरकार का गठन न हो जाए।

- हॉर्स ट्रेडिंग का मतलब हार्ड बार्गिनिंग (सौदेबाजी) से होता है। इसमें सौदेबाजी करने वाली दो पार्टियां अपने हितों को ध्यान में रखते हुए चतुराई से निर्णय करती हैं।

- ब्रिटिश इंग्लिश में यह टर्म नार्मली डिसअप्रूवल (अस्वीकृति) को बताती है।

# कैंब्रिज डिक्शनरी में क्या है मतलब

- कैंब्रिज डिक्शनरी में इसका मतलब, ऐसी अनौपचारिक बातचीत से है, जिसमें दो पार्टियां ऐसी आपसी संधि करती हैं जिसमें दोनों का फायदा हो।

- पॉलिटिक्स में जब कोई पार्टी विपक्षी सदस्यों को लालच देकर अपने साथ मिलाने की कोशिश करती है तो इस खरीद फरोख्त की पॉलिटिक्स को हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है।

# क्या है इस शब्द का इतिहास

- 'हॉर्स ट्रेडिंग' टर्म 1820 में सामने आया। हॉर्स ट्रेडिंग का मतलब घोड़ों की बिक्री से है। Macmillan इंग्लिश डिक्शनरी के मुताबिक, इसका मतलब कठिन और कभी-कभी उन लोगों के बीच बेईमान चर्चा है, जो किसी एक एग्रीमेंट पर पहुंचना चाह रहे हैं।

- कुछ जगह यह भी पता चलता है कि, 18वीं शताब्दी में इस शब्द का इस्तेमाल घोड़ों की बिक्री के दौरान किया जाने लगा। उस समय व्यापारी जब घोड़ों की खरीद-फरोक्त करते थे और कुछ अच्छा पाने के लिए जो जुगाड़ जमाते थे या चालाकी के लिए जो तकनीक अपनाते थे। इसे ही हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाने लगा।

- 20वीं और 21वीं सदी में इसका इस्तेमाल राजनीति तक पहुंचा। ऐसा बताया जाता है कि उस दौरान व्यापारी अपने घोड़ों को छुपा देते थे। फिर पैसों के लेनदेन की दम पर सौदा किया जाता था।

# एक किस्सा ये भी.

- एक किस्सा ये भी है कि पुराने समय में व्यापारी अपने कारिंदों को घोड़े खरीदने के लिए अरब देशों में भेजा करते थे। इतनी दूर से वापस आते वक्त कुछ घोड़े मर भी जाते थे।

- कारिंदे मालिक को संतुष्ट करने के लिए मरे हुए घोड़ों की पूंछ दिखाया करते थे। बाद में कारिंदों ने बेईमानी शुरू कर दी।

- उन्होंने मालिक से 100 घोड़ों के ही पैसे लिए। 90 घोड़े खरीदे और 10 घोड़ों की पूंछ के बाल खरीद लिए। मालिक को पूंछ दिखाकर संतुष्ट कर दिया और 10 घोड़ों से मिले पैसों का फायदा उठा लिया। हालांकि इस किस्से का कोई प्रमाण नहीं है।

बैंकों में वर्टिकल रैली से चूक गए? क्या आप अभी भी लॉन्ग जा सकते हैं?

बैंकिंग स्पेस पिछले कुछ महीनों से क्रिस्टल-क्लियर विनर रहा है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो निवेशकों के लिए सोने की खान बन गया है। हालांकि, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस बार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए सड़क पागल हो गई, जो कुछ साल पहले एक विकल्प नहीं थे। स्पष्ट रूप से, उनकी बैलेंस शीट की सफाई और कॉर्पोरेट आय में सुधार से निवेशकों का मन बदल रहा है।

आपको इसकी एक झलक देने के लिए कि बहुत कम समय में इन बैंकों ने कितनी तेजी से रैली की है, निफ्टी पीएसयू बैंक इंडेक्स जो 20 जून 2022 को 2,283 के आसपास था, अब 22 नवंबर 2022 को लगभग 3,970 पर है। लगभग 73% की विशाल रैली! और यहां हम अलग-अलग शेयरों की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि ट्रेडिंग क्‍या होती है? पूरे सेक्टोरल गेन की बात कर रहे हैं। मुझे याद नहीं कि पिछली बार मैंने इंडेक्स में इतनी जबरदस्त तेजी कब देखी थी।

कर्नाटक बैंक (NS: KBNK ), South Indian Bank (NS: SIBK ), UCO Bank (NS: UCBK ), आदि जैसे अलग-अलग काउंटरों पर पहले ही इस समय सीमा में दोगुना। लेकिन यहां सवाल यह है कि अगर आप इन दरों पर लॉन्ग जाने की योजना बनाते हैं तो इस रैली में कितनी संभावनाएं बची हैं? कुछ लोग सोच सकते हैं कि ये स्टॉक पहले से ही 50%, 70%, 100%, आदि हैं, इसलिए शायद अधिक खरीद लिया गया है और यहां से लंबे समय तक जाने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन किसी को यह जानने की जरूरत है कि जो स्टॉक एक गंभीर बुल रन में हैं, वे हमेशा मल्टीबैगर रिटर्न के रास्ते में ओवरबॉट हो जाएंगे। यहां, मैं कोई स्तर प्रदान नहीं कर रहा हूं लेकिन जोखिम प्रबंधन पर जोर देने की कोशिश कर रहा हूं।

हालांकि, इस रैली में भाग लेने से पहले, आपके पास एक स्पष्ट जवाब होना चाहिए कि अगर रैली फीकी पड़ने लगे तो आप कहां से बाहर निकलेंगे। ट्रेडिंग में यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है- रिस्क मैनेजमेंट। सवाल यह नहीं है कि स्टॉक यहां से कितनी दूर जा सकता है, लेकिन अगर यह होता है तो रैली के एक हिस्से पर कब्जा करने और यू-टर्न के मामले में लगभग पूरी तरह से बाहर निकलने के लिए आपकी कार्य योजना क्या है।

लंबे समय तक देखने पर, निफ्टी पीएसयू बैंक इंडेक्स 4,300 को छू सकता है जो इंडेक्स स्तर पर 8% -10% ऊपर की तरफ है। इसका मतलब यह है कि अलग-अलग स्टॉक आसानी से इससे अधिक का रन-अप दिखा सकते हैं। हालाँकि, मैं जोखिम प्रबंधन पर बहुत अधिक जोर देने का कारण यह है कि अधिकांश शेयरों में खुद को बहुत अधिक जोखिम में डाले बिना प्रवेश करने का कोई स्तर नहीं है। सूचकांक अपने आप में अत्यधिक खरीददार है, और यदि कोई सुधार आता है, तो ऐसे स्तरों का पता लगाना जहाँ ये स्टॉक संभवतः रुकेंगे, अपने आप में एक कार्य है।

हालांकि, अगर किसी के पास बाहर निकलने की योजना है तो वह आगे की तेजी को भुनाने की कोशिश कर सकता है, अन्यथा बाजार में अवसरों की कोई कमी नहीं है। एकमात्र सीमित चीज आपकी पूंजी है, इसलिए इसकी रक्षा करें।

मैं इसे लैरी हाईट के अपने पसंदीदा उद्धरणों में से एक के साथ जोड़ूंगा - "मेरे पास व्यापार के साथ-साथ जीवन में जीतने के दो बुनियादी नियम हैं: 1. यदि आप शर्त नहीं लगाते हैं, तो आप जीत नहीं सकते। 2. यदि आप अपने सभी चिप्स खो देते हैं, तो आप शर्त नहीं लगा सकते”।

बाइडन-शी मिले, बात हुई, फिर रिश्ते पटरी पर लौटने की उम्मीद क्यों नहीं?

जो बाइडन, शी जिनपिंग

मुलिया होटल में हुई इस मुलाक़ात पर पूरी दुनिया की नज़रें टिकी हुई थीं. इसकी अहमियत इसलिए भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कई साल बाद रूबरू हुए.

पिछले कुछ साल में अमेरिका और चीन के रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं. अमेरिका कभी ताइवान तो कभी रूस को लेकर चीन पर निशाना साधता रहा है तो चीन का कहना है कि अमेरिका उसके अंदरूनी मामलों में दखलअंदाज़ी कर रहा है.

ख़ैर रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिश में जिनपिंग और बाइडन ने एक-दूसरे से बात की, भले ही बहाना बना जी20 सम्मेलन.

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शी ने बाइडन से क्या कहा

"मिस्टर प्रेसिडेंट आपसे मिलकर अच्छा लगा. पिछली बार हम दावोस में मिले थे, पाँच साल पहले. आपके राष्ट्रपति (अमेरिका का) बनने के बाद हमने ऑनलाइन कॉल से संपर्क बनाए रखा. लेकिन आमने-सामने की मुलाक़ात अलग ही होती है. और आज हमारी और आपकी ये मुलाक़ात हो ही गई."

"हमारा अनुभव बढ़ा है, लेकिन हमने कई सबक भी सीखे हैं. सीखने के लिए इतिहास सबसे अच्छी किताब है और हमें इतिहास को आईने की तरह लेना चाहिए. अभी चीन और अमेरिका के रिश्ते जिस मोड़ पर हैं, हमें उन पर बहुत ध्यान दिया है. दो प्रमुख देशों के नेताओं के रूप में हमें सही रास्ता चुनने की ज़रूरत है. द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने और आगे ले जाने के लिए सही दिशा पाने की ज़रूरत है."

शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया की नज़र चीन और अमेरिका पर है. उन्होंने कहा, "दुनिया उम्मीद कर रही है कि अमेरिका और चीन अपने संबंधों को ठीक तरह से संभालें. हमारी मुलाक़ात पर लोगों की नज़रें टिकी हुई हैं. दुनिया में शांति कायम करने के लिए हमें दूसरे सभी देशों के साथ मिलकर काम करने की ज़रूरत है."

बाइडन क्या बोले

अमेरिकी राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच टकराव टालने की अहमियत पर ज़ोर दिया. उन्होंने माना कि आमने-सामने की मुलाक़ात की बात ही अलग है और इसका कोई विकल्प नहीं है.

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उन्होंने कहा, "दोनों के बीच बातचीत जारी रहनी चाहिए और मैं इसके लिए प्रतिबद्ध हूँ. ये इसलिए ज़रूरी है ताकि आकस्मिक वैश्विक मुद्दों पर तत्काल और एक साथ बात हो सके. फिर चाहे वो मुद्दा जलवायु परिवर्तन का हो या फिर सुरक्षा का."

बाइडन ने कहा कि दुनिया भी चाहती है कि दोनों देश पार्टनरशिप के रूप में काम करें.

बीबीसी संवाददाता स्टीफन मैकडॉनल के मुताबिक़ चीन इस मुलाक़ात से चाहता क्या है और हक़ीक़त में उसे मिलेगा क्या, ये दोनों अलग बातें हैं.

चीन और अमेरिका दोनों इस मुग़ालते में नहीं हैं कि उनके बीच तनाव किस क़दर है और उनके बीच रिश्तों की उस गर्माहट का लौटना किसी जादू से कम ट्रेडिंग क्‍या होती है? नहीं होगा, जो एक दशक पहले हुआ करते थे.

फिर शिकवा-शिकायत तो है ही. अमेरिका को शिकायत है कि चीन व्यापार के निर्धारित मानदंडों का लगातार उल्लंघन कर रहा है, जबकि जिनपिंग प्रशासन चाहेगा कि वह इस मुलाक़ात में तकनीकी क्षेत्र में अमेरिकी पाबंदियों के बारे में बात करे.

हालाँकि इस मुलाक़ात पर नज़र रखने वाला कोई भी पर्यवेक्षक दावे के साथ ये बोलने को तैयार नहीं कि दोनों देश बाधाओं को दूर कर भी पाएंगे या नहीं? लेकिन अच्छी बात ये है कि ये मुलाक़ात ऐसे वक़्त हो रही है जब दोनों देशों के रिश्ते शायद सबसे निचले स्तर पर हैं.

अगर दोनों राष्ट्रप्रमुख भविष्य में टकराव को टालने के कुछ उपायों पर भी सहमति बनाते दिखें तो इसे एक क़दम आगे बढ़ना माना जा सकता है.

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आर्थिक ताक़त के रूप में चुनौती दे रहा चीन?

चीन आर्थिक रूप से उनके लिए काफ़ी अहम है और सैन्य रूप से भी इतना ताक़तवर है कि कोई उसे खुलेआम चुनौती नहीं दे सकता.

43 साल पहले चीन और विएतनाम में युद्ध हुआ था. वहाँ चीन विरोधी भावनाएं बड़ी प्रबल रही हैं. लेकिन विएतनाम की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने ताक़तवर पड़ोसी से रिश्तों में सावधानी बरतती है.

दोनों देशों के बीच एक लंबी सरहद है. चीन विएतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.

साथ ही वो चीन की सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा है.

भारत को क्या है उम्मीद

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भारत को इस 17वें जी-20 सम्मेलन से क्या उम्मीद करनी चाहिए और 18वें जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता करने का ये मौका कितना महत्वपूर्ण है?

इस सवाल के जबाव में जेएनयू के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते ट्रेडिंग क्‍या होती है? हैं, "सबसे पहले तो जी 20 शिखर सम्मेलन की ये परंपरा रही है कि पिछले साल के अध्यक्ष और आने वाले साल के अध्यक्ष देश जो हैं वो एक-दूसरे के साथ निरंतर तालमेल बनाए रखते हैं. पिछले एक साल से भारत लगातार इंडोनेशिया से जुड़ा हुआ है कि जी-20 को किस तरफ़ ले जाना है और अलग-अलग मुद्दों को लेकर कैसे इस पर कैसे सहमति बनानी है. तो ये अच्छा अवसर होगा भारत के लिए दूसरे मुल्क़ के नेताओं से तालमेल बनाने का, उनको अगले साल भारत आने का निमंत्रण देने का और अपनी बात आगे रखने का."

"भारत ने बहुत से मुद्दे उठाए हैं, जैसे इंटरनेशनल सोलर एलायंस की बात हो या प्रधानमंत्री ने पिछले साल ग्लासगो में जो लाइफस्टाइल फॉर एनवायर्नमेंट की बात की थी, तो भारत को एक मौका मिलता इतने बड़े मंच से अपनी बात कहने का और उसको एक दिशानिर्देश देने का."

"इतने बड़े और शक्तिशाली फ़ोरम की अध्यक्षता मिलना भारत को, जो कि अब दुनिया की उभरती हुई पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और इन अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से वृद्धि दर वाला देश है, ये बड़ी बात है. इस पूरे परिप्रेक्ष्य में भारत को इन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ जुड़कर पहले अपने राष्ट्रहित को साधने का मौका मिलता है. इसके साथ-साथ पूरे विश्व में वित्तीय सोच औऱ वित्तीय तालमेल की बड़ी समस्याएं हैं. चाहे वो पर्यावरण को लेकर हो, ऊर्जा को लेकर हो, उनको कैसे सुलझाया जा सकता है, उस पर अपनी सोच सामने रखने और इन सभी अर्थव्यवस्थाओं को एक दिशानिर्देश देने का ट्रेडिंग क्‍या होती है? अच्छा अवसर मिलता है भारत को."

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रात्रि भोजन में क्या खायें? विकल्प की अधिकता असली समस्या है

थाई, पिज़्ज़ा, बर्गर, कोरियन, लेबनीज… ओह, यह तो मुफ़्त डिलीवरी की सुविधा दे रहा है। लेकिन वे बहुत दूर हैं और मैं भूखा हूं… जल्द ही राहत की यह भावना यह तय करने की असमर्थता में बदल जाती है कि क्या ऑर्डर करना है। साथ ही आपकी साथी भी इसमें अधिक मदद नहीं कर रही है।

यह स्थिति जानी पहचानी है? आप जिस चीज का अनुभव कर रहे हैं, उसे विकल्प की अधिकता कहा जाता है। यह स्थिति कभी-कभी ऐसी स्थिति में तब्दील हो जाती है जब आप निर्णय नहीं ले पाते हैं (यानी जब आप हार मान लेते हैं और इसके बजाय एक सैंडविच बना लेते हैं) और अंततः हम लिये गए निर्णय से समग्र रूप से कम संतुष्टि की ओर जाते हैं।

शुक्र है, विपणन और मनोविज्ञान के विद्वानों ने वर्षों से इस स्थिति का अध्ययन किया है और आपके जीवन को थोड़ा आसान बनाने के लिए सुझाव प्रदान कर सकते हैं। हालांकि पहले हमें इसे सुलझाने के लिए इसे समझने की जरूरत है।

उपरोक्त रात्रिभोज परिदृश्य में, ‘विकल्प जटिलता’’- विकल्प कैसे प्रस्तुत किए जाते हैं, ट्रेडिंग क्‍या होती है? कितने विकल्प हैं, उपलब्ध विकल्प उनकी विशेषताओं में कितने भिन्न हैं, हम प्रत्येक विकल्प के बारे में कितना पहले से जानते हैं – मुख्य दोषी हैं।

सबसे अच्छा विकल्प चुनने के लिए, ध्यान में रखने योग्य बहुत सी चीजें हैं: भोजन, डिलीवरी का समय, डिलीवरी की लागत, दूरी, स्वस्थ्यकर आदि। पहली नज़र में जो एक साधारण निर्णय लगता है, वह जल्द ही काफी जटिल हो जाता है।

जब अकेले भोजन की बात आती है तो लोग एक दिन में लगभग 200 विकल्प चुनते हैं, आप उस थकान को महसूस कर सकते हैं जो हमारे दिमाग को एक दिन के अंत में महसूस होती है।

एक और जटिल और बहुआयामी निर्णय का सामना करने पर संज्ञानात्मक अधिकता होगी: इसका मतलब है कि इष्टतम विकल्प तय करने के वास्ते सभी विकल्पों को समझबूझकर संसाधित करने और सभी सूचनाओं पर विचार करने के लिए आपके मस्तिष्क में संज्ञानात्मक संसाधन (मस्तिष्क शक्ति) नहीं है।

इसमें समस्या और समाधान निहित है: आपको हमेशा इष्टतम विकल्प बनाने की आवश्यकता नहीं होती। ‘ठीक है’ के साथ जाने से क्या गलत है?

विकल्पों की अधिकता होने की संभावना है क्योंकि आपका मस्तिष्क सचेत रूप से सभी बिंदुओं को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। तो तुम क्या करते हो?

यदि निर्णय लेना मुश्किल हो रहा है, तो रुकने का प्रयास करें और सोचने समझने में ज्यादा दिमाग न लगाएं। जब आप रात की अच्छी नींद के बाद फैसला लेंगे तो उस समय तक आपके मस्तिष्क ने अनजाने में सूचना को संसाधित कर लिया होगा और आप अधिक आत्मविश्वास से निर्णय लेने में सक्षम होंगे।

आपने लोगों को कहते सुना होगा, ‘‘ये एकदम सही फैसला लग रहा है?’’ अंत: प्रज्ञा कोई मिथकीय अवधारणा नहीं है जो आपके कानों में आकर सही फैसला लेने का मंत्र फूंक कर जाती है – यह आपका अवचेतन मन है जो सही फैसला करने की कड़ियों को आपस में जोड़ता है।

शायद ये बहुत अच्छा न लगे लेकिन विकल्पों की भरमार के मुकाबले, न्यूनतम विकल्प होना हमारी भलाई में बहुत महत्व रखता है और इसके कहीं अधिक अच्छे प्रभाव होते हैं ।

द कन्वरसेशन अमित नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

Horse Trading: क्‍या होती है हार्स ट्रेडिंग, सियासत में क्‍या मायने, राजनीति में कब से हुई इस शब्‍द की शुरुआत

Horse Trading in politics आखिर क्‍या होती है हार्स ट्रेडिंग सियासत में इसके क्‍या मायने हैं और राजनीति में इस शब्‍द की शुरुआत कब से हुई? दरअसल भारतीय राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल सांसदों और विधायकों ट्रेडिंग क्‍या होती है? को प्रलोभन से जोड़कर प्रयोग किया जाता है।

नोएडा, आनलाइन डेस्‍क। राजस्‍थान में राज्‍यसभा चुनाव को लेकर चल रहे सियासी बवाल के बीच मुख्‍यमंत्री गहलोत बार बार भाजपा पर हार्स ट्रेडिंग के आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर क्‍या होती है हार्स ट्रेडिंग, सियासत में इसके क्‍या मायने हैं और राजनीति में इस शब्‍द की शुरुआत कब से हुई? दरअसल, भारतीय राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल सांसदों और विधायकों को प्रलोभन से जोड़कर किया जाता है। जब किसी फायदे के लिए या किसी सरकार को अस्थिर करने के लिए सांसद या विधायक पाला बदलते हैं तो इसे हार्स ट्रेडिंग का नाम दिया जाता है।

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जानें हार्स ट्रेडिंग शब्‍द के मायने

हार्स ट्रेडिंग शब्‍द को सबसे पहले कैम्ब्रिज डिक्शनरी में शामिल किया गया था। जहां इस शब्‍द का मतलब परदे से पीछे दो पार्टियों के बीच होने वाली ऐसी बातचीत से था, जिसमें दोनों का फायदा हो। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हार्स ट्रेडिंग का मतलब कड़े शब्‍दों में तैयार की गई ऐसी सौदेबाजी से है जिसमें दोनों ही पार्टियां इस कोशिश में रहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा फायदा उन्हें हो जाए और बाद में एक नतीजे पर दोनों पार्टियां पहुंचती हैं। 1820 के आसपास घोड़ों की बिक्री के लिए ही इस शब्‍द का प्रयोग होता था।

रेल मंत्री का दावा- हर महीने 16 लाख लोगों को मिल रही नौकरियां

व्यापार का यह तरीका कुछ ऐसा था कि इसमें चालाकी, पैसा और आपसी फायदों के साथ घोड़ों को किसी के अस्तबल से खोलकर कहीं और छुपा देते थे। फिर पैसों के लेनदेन की दम पर सौदा किया जाता था। मतलब, कारोबारी अपने घोड़ों की खरीद फरोख्‍त के लिए जो अलग अलग तरीके अपनाते थे, उन्‍हें ही हार्स ट्रेडिंग कहा जाता था। बाद में इस शब्‍द का इस्‍तेमाल पॉलिटिक्‍स के लिए होने लगा। जब एक पार्टी विपक्ष में बैठे अन्‍य नेताओं को अपने साथ मिलाने के लिए हर तरह का लालच देती है। इस किस्म की विधायकों की खरीद फरोख्त को राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है। Macmillan इंग्लिश डिक्शनरी के मुताबिक, इसका मतलब कठिन और कभी-कभी उन लोगों के बीच बेईमान चर्चा है, जो किसी एग्रीमेंट पर पहुंचना चाह रहे हैं।

जयपुर में नाबालिग से दुष्कर्म कर बनाया अश्लील वीडियो। फाइल फोटो

भारतीय राजनीति में कब से हार्स ट्रेडिंग

कहा जाता है कि भारतीय राजनीति में हार्स ट्रेडिंग की शुरुआत 1967 से हुई। अक्टूबर, 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने 15 दिनों के भीतर तीन बार दल बदलकर इस मुद्दे को राजनीति की मुख्यधारा में ला दिया था। उस दौर में ‘आया राम गया राम’ की राजनीति देश में काफी प्रचलित हो चली थी। इस मौकापरस्ती की प्रथा को बंद करने के लिए 1985 में 52वां संविधान संशोधन किया गया और संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई जिससे कि पार्टी छोड़कर भागने की प्रथा पर काबू पाया जा सके।

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